सोमवार, 26 जून 2017

चंदन है इस देश की माटी  - श्री फक्कड़ मुरादाबादी



पुस्तक परिचय


कृति : चंदन है इस देश की माटी (देशभक्ति गीत-संग्रह)
सर्वाधिकार : कवि
रचनाकार : श्री फक्कड़ मुरादाबादी
 रामगंगा विहार कालोनी, 1-2, बसेरा नगर सहकारी समिति, 
निकट विल्सोनिया डिग्री कालिज, मुरादाबाद - 244001 (उ.प्र.)
मोबाइल : 09410238638
संस्करण : प्रथम
प्रकाशन वर्ष : 2016
पृष्ठ : 16
मूल्य : देश प्रेम
प्रकाशक : सागर तरंग प्रकाशन,
डी-12, अवंतिका कालोनी, एम.डी.ए., मुरादाबाद (उ.प्र.)
मोबाइल : 9411809222


CHANDAN HAI IS DESH KI MATI BY FAKKAR MORADABADI


मंगलवार, 20 जून 2017

सूर्य नारायण शूर की ग़ज़ल

  है सूरज बादलों  में पर  तपन  महसूस होती है

चला थोड़ा ही हूँ फिर  भी थकन  महसूस  होती  है 
है सूरज बादलों  में पर  तपन  महसूस होती है

नहीं मालूम उसने क्या छिपा  रक्खा   है आँखो में 
मिली जब से ये नज़रे है चुभन  महसूस  होती है

यहाँ की अब मुझे आबो  हवा  अच्छी  नहीं लगती  
यहाँ से ले  चलो  मुझको घुटन  महसूस होती है

दिया जबसे  मुझे उसने सरे  बाज़ार  यूँ  धोखा  
कहीं भी देख कर उसको  जलन  महसूस होती है 

बहुत बौना बना  डाला  जहाँ ने  सोच को अपनी  
हकीकत  है जहाँ में अब उबन महसूस  होती है 


- सूर्य नारायण शूर
इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश 
सम्पर्क सूत्र :- 9984725044, 9452816164
Email :- shoorsn@gmail.com

मंगलवार, 13 जून 2017

आचार्य बलवन्त का गीत : बाबा की चौपाल

बाबा की चौपाल



बूढ़ा बरगद देख रहा युग की अंधी चाल।
बरसों से सूनी लगती है बाबा की चौपाल।
पाँवों की एड़ियाँ फट गईं,
बँटवारे में नीम कट गई,
कोई खड़ा है मुँह लटकाए,  कोई फुलाए गाल।
बरसों से सूनी  लगती है बाबा की चौपाल।
बाँट दी गई माँ की लोरी,
मुन्ने की बँट गई कटोरी,
भेंट चढ़ गया बँटवारे की पूजावाला थाल।
बरसों से सूनी लगती है बाबा की चौपाल।   
आँगन से रूठा उजियारा,
खामोशी ने पाँव पसारा, 
चहल-पहल अब नहीं रही,सूखी सपनों की डाल।
बरसों से सूनी लगती है बाबा की चौपाल।

-आचार्य बलवन्त
विभागाध्यक्ष हिंदी
कमला कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट स्टडीस
450, ओ.टी.सी.रोड, कॉटनपेट, बेंगलूर-560053 (कर्नाटक) 
मो. 91-9844558064 , 7337810240   
Email- balwant.acharya@gmail.com

रविवार, 26 मार्च 2017

जितेन्द्र कुमार जौली की पुस्तक हमारे महापुरुष का किया गया लोकार्पण 

'हमारे महापुरुष' का किया गया लोकार्पण 

            दिनांक 26 मार्च, 2017 को अखिल भारतीय अम्बेडकर युवक संघ की एक बैठक सिविल लाइन्स, मुरादाबाद स्थित डॉ0 अम्बेडकर पार्क में आयोजित की गई। बैठक में अखिल भारतीय अम्बेडकर युवक संघ द्वारा प्रकाशित एवं जितेन्द्र कुमार जौली द्वारा लिखित पुस्तक 'हमारे महापुरुष' (जीवनी संग्रह) का लोकार्पण किया गया।

 

            पुस्तक के सम्पादक एवं संघ के राष्ट्रीय महासचिव श्री महेंद्र पाल सिंह ने बताया कि हमारी नई पीढ़ी को यह मालूम नहीं कि हमारे लिए किसने क्या किया है? यह पुस्तक नई पीढ़ी को हमारे महापुरुषों के जीवन परिचय एवं त्याग से परिचित कराएगी।

             संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री दौलत सिंह ने बताया कि अखिल भारतीय अम्बेडकर युवक संघ के तत्वावधान में दिनांक 9 अप्रैल,  2017 को प्रातः 11:00 बजे से चित्रगुप्त  इण्टर कॉलेज, मुरादाबाद में 'डाॅ0 अम्बेडकर सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता' का आयोजन किया जाएगा। प्रतियोगिता में भाग लेने वाले प्रतियोगियों को तैयारी हेतु 'हमारे महापुरुष' पुस्तक प्रदान की जाएगी। 

             बैठक में श्री दौलत सिंह, महेन्द्र पाल सिंह, मुकेश कुमार गौतम, महावीर प्रसाद मौर्या! जितेन्द्र कुमार जौली, जयपाल सिंह, कृष्णपाल सिंह, जगदीश चंद्र, राजेश कुमार, हरगोविंद सिंह, राम सिंह गौतम, ग्रंथ सिंह, बी0 एस0 भारती, तारा सिंह, बाली सिंह भारती, भयंकर सिंह बौद्ध, करन सिंह, रविन्द्र सिंह, राजेंद्र चौधरी, भारत सिंह आदि ने भाग लिया।

मंगलवार, 31 जनवरी 2017

सुरेश भारद्वाज निराश की गज़ल : तन्हा बड़ी हैं रातें, सताया न कीजिये

तन्हा  बड़ी   हैं   रातें,  सताया न कीजिये


सपनों  में   आके   मेरे,  जाया  न कीजिये
तन्हा  बड़ी   हैं   रातें,  सताया न कीजिये।

तेरे  ही   ख्यालों   में,   जिन्दगी  वसर हुई,
दिल  तोड़   कर   मेरा,  जाया न कीजिये।

पर्वतों की  चोटियां भी बदली से ढक गयीं,
सावन में मीत  मुझको, रुलाया न कीजिये।

गीतों  में   तेरे  हमने  खुद   को डुबो दिया,
चलते इधर - ऊधर  गुनगुनाया न कीजिये।

जख्मों का दर्द अब , कुछ  और बढ़ गया है,
मरहम लगा के इनको सहलाया न कीजिये।

जुल्फें तुम्हारी  ऐसी बदली सावन के जैसी,
धूप  में   धोकर इन्हें  सुखाया  न  कीजिये।

तुम  हो  मेरी  पूजा  मेरी  अर्चना  हो  तुम,
मेरे   लिये  खुदा को  मनाया  न  कीजिये।

यारा अब तो चाँद भी जलने लगा है तुमसे,
चांदनी  में  बैठ   कर  नहाया  न  कीजिये।

देखा  है जब से  तुमको मर  चुके हैं हम तो,
नज़रें मिला कर हमको तड़पाया न कीजिये।

जी   नहीं  सकेंगे    बिन  तुम्हारे  अब  हम,
दांतों  में होंठ  लेकर मुस्काया  न  कीजिये।

इन्सां बदल गया है नीयत  की  है बात क्या,
गैरत बेगैरत बोलकर समझाया  न कीजिये।

पक्के घरों से  भी अब बस्तीं  नहीं  बस्तियां,
निराश घर अब  रेत के  बनाया  न कीजिये।

-सुरेश भारद्वाज 'निराश'
ए- 58 न्यू धौलाधार कलोनी
लोअर बड़ोल पी.ओ.दाड़ी
तहसील  धर्मशाला,
जिला कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश)
सम्पर्क सूत्र  9418823654
                   9805385225
Email- nirashscb@gmail.com

गुरुवार, 19 जनवरी 2017

संजय वर्मा "दृष्टी "की कविता : क्या जिंदगी आधुनिक हो गई

क्या जिंदगी आधुनिक हो गई


क्या जिंदगी आधुनिक हो गई 

माँ अब नहीं देखती दीवार पर धुप आने का  समय 
अचार बनाने  में क्या मिलाया जाए  और कितना 
बूढ़े पग अब नहीं दबाए जाते अब क्यों 
क्या जिंदगी आधुनिक हो गई

चश्मे के  नम्बर कब बढ़ गए 
सुई में धागा नहीं डलता कांप रहे हाथ कोई मदद नहीं 
बूढ़ों को संग ले जाने में शर्म हुई पागल अब क्यों 
क्या जिंदगी आधुनिक हो गई

घर के पिछवाड़े से आती खांसी की आवाजें 
कोई सुध लेने वाला क्यों नहीं 
संयुक्त दीखते परिवार  मगर लगता अकेलापन 
कुछ खाने की लालसा मगर कहने में संकोच  क्यों   
क्या जिंदगी आधुनिक हो गई

बुजुर्गो का आशीर्वाद /सलाह /अनुभव पर लगा जंग 
भाग दौड़ भरी दुनिया में उनके पास बैठने का समय क्यों नहीं 
गुमसुम से बैठे पार्क में और अकेले जाते धार्मिक स्थान अब क्यों  
क्या जिंदगी आधुनिक हो गई

बुजुर्ग है तो रिश्ते है ,नाम है , पहचान है 
अगर बुजुर्ग नहीं तो बच्चों की  कहानियाँ बेजान है 
ख्याल ,आदर सम्मान को करने लगे नजर अंदाज अब क्यों  
क्या जिंदगी आधुनिक हो गई

-संजय वर्मा "दृष्टी "
125 शहीद भगत सिंह मार्ग 
मनावर जिला धार (मध्य प्रदेश)
सम्पर्क सूत्र : 9893070756

सोमवार, 7 नवंबर 2016

सत्यानन्द मिश्र शुभम के मुक्तक

सत्यानन्द मिश्र 'शुभम' के मुक्तक



रूप अनूप तेज सूर्य सा चन्द्र से उज्जवल बदन तुम्हारे,
चितवन चकित सुकोमल नैन पुलकित मन हो देख हमारे।
नैन कजरारे कटार से तीखे म्यान के कोर से कोर हैं प्यारे,
चंचल मन बस में कर ले अधरें हैं लाल गुलाब से न्यारे ॥

अल्हड़ मुखड़ा रूप सलोना तन मखमल सा गजब सुहावे,
मस्त अदा श्रृंगार मस्त है मस्त स्वरूप होश बिसरावे।
रूप मनोरम चन्द्र छवि सी सूरत चाँद सा टुकड़ा भावे,
मुख मण्डल है जैसे कुमुदनी देख देख जन अति सुख पावे ॥

केश घटा घनघोर सा उमड़े लटों को जब तुम बिखराती,
दिल का धड़कन बढ़ जाता जब देख हमें तुम मुस्काती।
खिले पुष्प सा खिला है चेहरा उर भीतर जो समा जाती,
अदा दिखाकर प्रेम की ज्वाला अन्तर्मन में जगा जाती ॥

- सत्यानन्द मिश्र "शुभम"
पता :- ग्राम मलमलिया 
पोस्ट- बाँक बाज़ार , उतरौला
जिला - बलरामपुर (उ. प्र.)
सम्पर्क सूत्र  : 72680 88870